अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 10

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करके, अपने कर्मों में मोह और संलग्नता को त्यागकर कार्य करता है, वह पाप से मुक्त रहता है। जैसे कमलपत्र पानी में डूबता नहीं है, वैसे ही उस व्यक्ति के कर्म भी उसे पाप से नहीं लिप्त करते। इस प्रकार, कर्म करने का सही तरीका यही है कि उसे पूर्ण समर्पण और निस्संगता के साथ किया जाए, जिससे व्यक्ति पाप और कर्मों के फलों से परे रह सके।