अध्याय 4: दिव्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 8

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संस्कृत श्लोक

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

हिंदी अर्थ

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

परित्राणाय साधूनाम्: यहाँ 'साधू' शब्द से अभिप्राय है सज्जन, भक्त, या धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोग। भगवान का अवतार लेना मुख्यतः साधुजनों की रक्षा के लिए होता है। जब धर्मपरायण और सच्चे भक्त संकट में होते हैं, तब भगवान उनके रक्षण के लिए प्रकट होते हैं।

विनाशाय च दुष्कृताम्: 'दुष्कृताम्' का अर्थ है दुष्ट या पापी लोग, जो अधर्म के मार्ग पर चलते हैं। ऐसे लोगों का विनाश करना भी भगवान के अवतार का एक उद्देश्य होता है। अधर्म और अन्याय को समाप्त करना आवश्यक है ताकि समाज में संतुलन बना रहे।

धर्मसंस्थापनार्थाय: भगवान का अवतार केवल सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए नहीं होता, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए भी होता है। 'धर्म' से तात्पर्य है नैतिकता, सच्चाई, और सद्गुणों की स्थापना। जब धर्म की नींव कमजोर होती है, तब भगवान उसे पुनः स्थापित करने आते हैं।

सम्भवामि युगे युगे: 'युगे युगे' से अभिप्राय है हर युग में, या समय-समय पर। यह भगवान के अवतार की निरंतरता को दर्शाता है। जब भी मानवता संकट में होती है, भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं।

इस श्लोक से हमें यह संदेश मिलता है कि भगवान सदैव धर्म और न्याय की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। अधर्म चाहे जितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः धर्म की विजय होती है और भगवान की कृपा से धर्म की पुनः स्थापना होती है।