अध्याय 4: दिव्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 5

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संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे केवल एक साधारण मानव नहीं हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं के अवतारों और जन्मों के बारे में बताते हुए कहा है कि उनके और अर्जुन के कई जन्म हो चुके हैं। परंतु अंतर यह है कि श्रीकृष्ण उन सभी जन्मों को याद रखते हैं, जबकि अर्जुन उन जन्मों को नहीं जानता। इसका मुख्य कारण यह है कि श्रीकृष्ण एक दिव्य आत्मा हैं, जो हर जन्म में अपनी दिव्यता और ज्ञान को बनाए रखते हैं, जबकि अर्जुन जैसे सामान्य मानव जन्म और मृत्यु के चक्र में उलझे हुए हैं और अपने पिछले जन्मों की स्मृति नहीं रख पाते।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उनका ज्ञान और चेतना सीमित नहीं है; वे सर्वज्ञ हैं। वे कालातीत हैं और सृष्टि के रहस्यों से पूरी तरह परिचित हैं। इसके विपरीत, सामान्य जीव अपनी स्मृति और समझ में सीमित होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का यह कहना अर्जुन के लिए यह संकेत है कि वे केवल एक मित्र या सारथी नहीं, बल्कि सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, जिनकी दिव्यता और ज्ञान अनंत हैं।