अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥
हिंदी अर्थ
यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह आश्वासन दे रहे हैं कि ज्ञान की महत्ता और शक्ति अत्यधिक होती है। वे कहते हैं कि, "यदि तुम सभी पापों में भी सबसे बड़े पापी हो, तब भी ज्ञान के नाव के माध्यम से तुम उन सभी पापों को पार कर सकते हो।"
यह श्लोक यह सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि ज्ञान, विशेषकर दिव्य ज्ञान, पाप और अज्ञान के समुद्र को पार करने की क्षमता रखता है। जैसे एक नाव समुद्र को पार करती है, वैसे ही ज्ञान व्यक्ति को उसके पापों और आध्यात्मिक अज्ञान के समुद्र से निकाल सकता है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह समझाना चाहते हैं कि चाहे व्यक्ति कितना भी पापी क्यों न हो, ज्ञान की प्राप्ति से उसे उद्धार मिल सकता है। ज्ञान एक अमूल्य सम्पत्ति है जो जीवन को सही दिशा और अर्थ प्रदान करता है, और इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।