अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
हिंदी अर्थ
जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए।) और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा। (गीता अध्याय 6 श्लोक 30 में देखना चाहिए।)
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति इस दिव्य ज्ञान को जान लेता है, वह पुनः मोहित नहीं होता। इस ज्ञान के माध्यम से वह आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को जान सकता है। इस ज्ञान की प्राप्ति से व्यक्ति को सम्पूर्ण सृष्टि के अस्तित्व की सच्चाई समझ में आती है, और वह अपने भीतर और भगवान में एकता को महसूस करता है।
यह श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है कि दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति की अज्ञानता और भ्रम समाप्त हो जाते हैं। जब वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब वह समस्त भूतों और सृष्टि की वास्तविकता को भी समझ जाता है। इस प्रकार, ज्ञान की प्राप्ति से व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है, और वह संसार के भ्रम और मोहर से मुक्त हो जाता है।