अध्याय 4: दिव्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 22

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संस्कृत श्लोक

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

हिंदी अर्थ

जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे व्यक्ति की विशेषताएँ बताई हैं जो आत्मा की सच्ची समझ से संपन्न है। यहाँ पर 'यदृच्छालाभ' का अर्थ है जो किसी भी चीज़ को आकस्मिक रूप से प्राप्त करने पर संतुष्ट रहता है। 'सन्तुष्ट' का अर्थ है जो अपने हालात से पूरी तरह प्रसन्न है, और 'द्वन्द्वातीत' का मतलब है जो द्वंद्व या संघर्ष (सुख-दुख, लाभ-हानि) से ऊपर उठ चुका है।

इस व्यक्ति में 'विमत्सरः' का मतलब है जो ईर्ष्या और द्वेष से मुक्त है। 'समः सिद्धावसिद्धौ च' का अर्थ है कि वह व्यक्ति सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (असफलता) दोनों को समान दृष्टि से देखता है।

अर्थात, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति ऐसे गुणों से युक्त है, वह संसार के सुख-दुख से अज्ञात रहता है और अपनी स्थिति से अप्रभावित रहता है। ऐसे व्यक्ति के लिए कोई भी कर्म या कार्य बंधनकारी नहीं होता, क्योंकि वह अपने मन और आत्मा में पूरी तरह संतुलित और निर्विकार रहता है।