अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥
हिंदी अर्थ
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
सरल हिंदी व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को बता रहे हैं कि इस दिव्य ज्ञान को पहले राजर्षियों (राजा-मुनियों) ने परंपरा के माध्यम से प्राप्त किया था। राजर्षियों का अर्थ है वे राजा जो आध्यात्मिक ज्ञान में भी निपुण होते थे। उन्होंने इस ज्ञान को समझा और इसका पालन किया।
लेकिन समय के साथ, इस परंपरा का लोप हो गया, और यह योग (ज्ञान) धीरे-धीरे विलुप्त हो गया। इसका कारण यह है कि जैसे-जैसे समय बीता, लोग इस ज्ञान से विमुख हो गए और इस तरह यह पवित्र ज्ञान, जो परंपरागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाता था, खो गया।
श्रीकृष्ण यहाँ पर अर्जुन को यह बता रहे हैं कि वे उसी प्राचीन योग को फिर से प्रकट करने जा रहे हैं, जिससे अर्जुन और आने वाली पीढ़ियों को लाभ हो सके। अर्जुन को 'परन्तप' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'शत्रुओं को संतप्त करने वाला', जो यह दर्शाता है कि वह इस दिव्य ज्ञान को धारण करने और इसे फैलाने में सक्षम है।
इस श्लोक से यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान का आदान-प्रदान एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसे समय के साथ जीवित रखना चाहिए, ताकि यह जीवन के सभी पहलुओं में मार्गदर्शन कर सके।