अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
हिंदी अर्थ
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कर्म और अकर्म की सही समझ को लेकर हमें शिक्षित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति कर्म के रूप में अकर्म देखता है और अकर्म के रूप में कर्म देखता है, वह वास्तव में बुद्धिमान होता है। इसका अर्थ है कि एक ज्ञानी व्यक्ति कर्म और उसके परिणामों को भलीभांति समझता है और उनके बीच की सही परख रखता है।
आम तौर पर, लोग कर्म को केवल बाहरी गतिविधियों के रूप में मानते हैं, जबकि कई बार कर्म का वास्तविक स्वरूप आंतरिक स्थिति या सोच में होता है। इसी तरह, अकर्म भी केवल बाहरी तौर पर निष्क्रियता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह किसी कार्य के लिए उचित समय पर सही निर्णय लेने का संकेत हो सकता है।
इस प्रकार, जो व्यक्ति इस समग्र दृष्टिकोण को अपनाता है और कर्म और अकर्म के अंतर को समझता है, वह वास्तव में योगी और पूर्ण कर्मयोगी होता है। ऐसे व्यक्ति को "कृत्स्नकर्मकृत्" अर्थात् सम्पूर्ण कर्मयोगी कहा जाता है, क्योंकि वह न केवल कर्म में निपुण होता है बल्कि कर्म के वास्तविक अर्थ को भी समझता है।