अध्याय 3: कर्मयोग
भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
हिंदी अर्थ
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी निष्क्रिय नहीं रह सकता। यहाँ "न हि कश्चित्" का तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति कर्म किए बिना नहीं रह सकता।
श्लोक के अनुसार, हर व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के कर्म करता है, क्योंकि कर्म करना उसके स्वभाव का हिस्सा है। "जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्" का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। यहाँ "कर्म" से तात्पर्य उन सभी क्रियाओं से है जो मन, वचन और शरीर द्वारा की जाती हैं।
"कार्यते ह्यवशः कर्म" वाक्यांश यह दर्शाता है कि व्यक्ति अनायास ही कर्म करता है, और यह कर्म उसके स्वभाव के गुणों के कारण होता है। "प्रकृतिजैर्गुणैः" का अर्थ है कि ये कर्म उसके प्राकृतिक गुणों और स्वभाव द्वारा प्रेरित होते हैं।
इस प्रकार, श्लोक हमें यह समझाता है कि कर्म करना स्वाभाविक और अनिवार्य है। कोई भी व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करता है, और यह कर्म उसकी प्रकृति और गुणों द्वारा प्रेरित होता है।