अध्याय 3: कर्मयोग

भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 11

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संस्कृत श्लोक

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

हिंदी अर्थ

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक का तात्पर्य है कि मनुष्यों को देवताओं की पूजा और उनकी सेवा करनी चाहिए। जब लोग देवताओं की पूजा करते हैं, तो देवता भी उनकी सेवा करते हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह आपसी सहयोग और समर्थन का एक चक्र बनता है, जिसमें देवता और मनुष्य दोनों एक-दूसरे की भलाई के लिए प्रयास करते हैं। इस प्रकार, परस्पर सहयोग और सहायता के माध्यम से, अंततः दोनों ही अति उत्तम परिणाम प्राप्त करते हैं।

श्लोक का हिंदी में अर्थ इस प्रकार है:

“देवताओं की पूजा और उनके प्रति भक्ति से, देवता भी तुम्हारी भलाई करेंगे। जब आपस में एक-दूसरे की भलाई करेंगे, तब आप दोनों परम कल्याण को प्राप्त होंगे।”

इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि धार्मिक कर्तव्यों और यज्ञों का पालन करने से केवल व्यक्तिगत लाभ ही नहीं, बल्कि एक सामूहिक और परस्पर लाभ की प्राप्ति होती है।