अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 69

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संस्कृत श्लोक

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

हिंदी अर्थ

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है

सरल हिंदी व्याख्या

यह श्लोक भगवद गीता के दूसरे अध्याय में आता है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को योग और ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उस व्यक्ति की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जो संयमी है और जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो बात साधारण प्राणियों के लिए अंधकारमय और अज्ञात है, उसी बात को संयमी व्यक्ति समझता है और जागरूक रहता है। अन्य प्राणियों की दृष्टि में जो ज्ञान या सत्य अंधकारमय है, वही एक ज्ञानी व्यक्ति के लिए प्रकाश है।

इसका अर्थ यह है कि साधारण मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं, इच्छाओं और वासनाओं में उलझे रहते हैं। उनके लिए आत्मा का ज्ञान और आत्मा का अनुभव किसी अंधेरी रात की तरह होता है, जिसे वे देख नहीं पाते। वहीं, एक संयमी व्यक्ति, जिसने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है और आत्मज्ञान को प्राप्त कर लिया है, वह इस अंधकार को पार करके सत्य को देख पाता है। वह सांसारिक इच्छाओं और मोह-माया के अंधकार से ऊपर उठ चुका होता है और उसे आत्मज्ञान का प्रकाश दिखाई देता है।

इस श्लोक में 'मुनी' का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो मन और इंद्रियों पर संयम रखता है और 'संयमी' का मतलब है वह जो संयमित है, अर्थात जिसने अपनी इंद्रियों और मन को वश में कर लिया है।

इस प्रकार, इस श्लोक का सार यह है कि जो व्यक्ति संयमी और आत्मज्ञानी होता है, वह उस सत्य को देख सकता है जो अन्य सामान्य प्राणियों के लिए अदृश्य और अज्ञात रहता है। साधारण व्यक्ति जिन चीज़ों में रात्रि (अंधकार) अनुभव करते हैं, वही एक ज्ञानी व्यक्ति के लिए दिन (प्रकाश) के समान होती हैं।