अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 5

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संस्कृत श्लोक

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-

ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव

भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

हिंदी अर्थ

इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में अर्जुन अपने गुरु और सम्मानित पितरों को मारने के परिणाम पर विचार कर रहे हैं। वह कहते हैं कि महान और सम्मानित गुरुओं की हत्या करना अत्यंत दुःखदायी होगा, भले ही उसके बदले में उसे भिक्षाटन करके जीवन यापन करना पड़े। अर्जुन की चिंता है कि यदि वे अपने गुरु और परिवारजनों को मार डालते हैं, तो उनका जीवन कैसे सुखद हो सकता है? श्लोक में यह भी कहा गया है कि ऐसे भोगों का सेवन करना जो रक्त से सने हों, जैसे युद्ध में प्राप्त किए गए हों, उनके लिए अत्यंत अशुभ और दुखदायक होगा।

अर्जुन की यह बात इस पर जोर देती है कि स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ के लिए आदर्श और नैतिकता को त्यागना नहीं चाहिए। गुरु और आदरणीय व्यक्तियों की हत्या करने से प्राप्त किए गए भोग, चाहे वे कितने भी सुखद क्यों न लगें, वे अंततः अशुद्ध और दुःख देने वाले होते हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि किसी भी अनैतिक कार्य के परिणाम हमेशा नकारात्मक होते हैं और इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए।