अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 25

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संस्कृत श्लोक

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

हिंदी अर्थ

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं। वे बताते हैं कि आत्मा अव्यक्त (अप्रकट), अचिंत्य (अकल्पनीय), और अविकार (निवर्तनीय) है। यहाँ भगवान कह रहे हैं:

अव्यक्तोऽयम् - आत्मा अप्रकट है, यानी यह शारीरिक इंद्रियों से पकड़ में नहीं आता। यह निर्गुण और निर्लेप है, जिसे साधारण अनुभवों या इंद्रियों से समझा नहीं जा सकता।

अचिन्त्योऽयम् - आत्मा को हम कल्पना या विचार से भी समझ नहीं सकते। यह तर्क और चिंतन से परे है, क्योंकि इसका स्वभाव और स्वरूप असीम और अज्ञेय है।

अविकार्योऽयम् - आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है और इसलिए यह निरंतर और अपरिवर्तनीय है।

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह ज्ञान दे रहे हैं कि आत्मा के वास्तविक स्वभाव को जानकर ही हमें जीवन की घटनाओं और शारीरिक परिवर्तन पर दुःख या चिंता नहीं करनी चाहिए। यदि आत्मा अनित्य और अविनाशी है, तो शारीरिक मृत्यु केवल शरीर के लिए है, आत्मा के लिए नहीं। इस ज्ञान को समझकर अर्जुन को युद्ध और जीवन की अन्य परिस्थितियों में शांति बनाए रखनी चाहिए।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि आत्मा की अमरता और उसके स्थायी स्वभाव को समझकर हम जीवन के दुख-सुख से परे, शांतिपूर्वक जी सकते हैं।