अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 24

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संस्कृत श्लोक

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

हिंदी अर्थ

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अविनाशिता और स्थिरता का वर्णन कर रहे हैं।

अच्छेद्यः (अच्छेद्यः): जिसका कभी भी विच्छेदन (कटना) न किया जा सके। आत्मा न तो कभी काटी जा सकती है और न ही उसके अस्तित्व को समाप्त किया जा सकता है। अदाह्यः (अदाह्यः): जिसका जलाया न जा सके। आत्मा को किसी भी आग से नहीं जलाया जा सकता, यह अग्नि से प्रभावित नहीं होती। अक्लेद्यः (अक्लेद्यः): जो कि कभी भी गीला या भीगा नहीं हो सकता। आत्मा पर कोई भी जल का प्रभाव नहीं पड़ता। अशोष्यः (अशोष्यः): जो कभी भी सूखा नहीं सकता। आत्मा पर सूखे का कोई असर नहीं होता, यह हमेशा स्थिर रहती है। नित्यः (नित्यः): जो हमेशा विद्यमान रहती है, जिसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता। सर्वगतः (सर्वगतः): जो हर जगह उपस्थित है, सर्वत्र व्याप्त है। स्थाणुः (स्थाणुः): जो स्थिर और अपरिवर्तनीय है, जो कभी बदलता नहीं। अचलः (अचलः): जो अडिग और स्थिर है, जो किसी भी प्रकार की हलचल से प्रभावित नहीं होता। सनातनः (सनातनः): जो सदा से और हमेशा के लिए विद्यमान है, जिसका कोई प्रारंभ और अंत नहीं होता। इस श्लोक का संदेश यह है कि आत्मा निराकार, अविनाशी और स्थिर है। यह शरीर, मन और इंद्रियों के परिवर्तनों से अप्रभावित रहती है। आत्मा का स्वरूप अनंत और शाश्वत है, और यह समय, स्थान या परिस्थिति से स्वतंत्र होती है। इस प्रकार, आत्मा की इस अपरिवर्तनीयता को समझना और अनुभव करना व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए।