अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 7

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संस्कृत श्लोक

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥

हिंदी अर्थ

(निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्म का (इसी अध्याय के श्लोक 48 की टिप्पणी में इसका अर्थ देखना चाहिए।) स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है

सरल हिंदी व्याख्या

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते: अर्थात् जिन कर्मों का त्याग करना नियत नहीं है, अर्थात् जिन कर्मों को करने की हमें आवश्यकता होती है, जैसे कि दैनिक कर्म, धार्मिक कर्तव्य आदि, उनका त्याग नहीं किया जाना चाहिए। ये कर्म व्यक्ति के जीवन की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़े हुए होते हैं।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः: मोह के कारण यदि इन कर्मों का त्याग किया जाता है, तो यह तामसिक त्याग कहा जाता है। तामसिक त्याग का अर्थ है कि ऐसा त्याग आलस्य, अज्ञानता या भ्रम की स्थिति से प्रेरित होता है। इस प्रकार का त्याग उचित नहीं होता और यह आत्मा की उन्नति के मार्ग में बाधा डालता है।

सार:

इस श्लोक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि हमें नियत कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। ये कर्म हमें अपने कर्तव्यों को निभाने और जीवन में संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। मोह या भ्रम की स्थिति से प्रेरित होकर यदि हम इन कर्मों का त्याग करते हैं, तो यह एक तामसिक और दोषपूर्ण त्याग होगा, जो हमारे आत्मा के विकास में रुकावट डालता है।