अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
हिंदी अर्थ
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उन व्यक्तियों की विशेषता का वर्णन किया है, जो उनके प्रिय होते हैं। यहाँ, श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मनुष्यों में कोई भी ऐसा नहीं है, जो उनके द्वारा किए गए प्रिय कार्य से अधिक प्रिय हो। यह उस व्यक्ति की महत्ता को दर्शाता है जो ईश्वर की सेवा, उनकी उपासना और उनकी शिक्षाओं का पालन करता है।
ईश्वर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके लिए ऐसे व्यक्ति की कोई समानता नहीं है और भविष्य में भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो उनकी दृष्टि में अधिक प्रिय हो। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके प्रिय कार्यों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और ऐसे लोग, जो भगवान की शिक्षाओं का पालन करते हैं और उनके प्रति समर्पित होते हैं, उनके लिए अनन्त प्रिय होते हैं।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अपने भक्तों के प्रति अपार प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं, जो उनके मार्ग पर चलकर उनके द्वारा बताई गई सच्चाइयों और कार्यों का अनुसरण करते हैं।