अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 70

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संस्कृत श्लोक

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ (गीता अध्याय 4 श्लोक 33 का अर्थ देखना चाहिए।) से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य संवाद, गीता, के महत्व को स्पष्ट कर रहे हैं। वे यह कहते हैं कि जो व्यक्ति इस धर्ममय संवाद को, जिसे हमने (भगवान कृष्ण और अर्जुन ने) मिलकर गाया है, पढ़ेगा, उसकी श्रद्धा और समर्पण से वे भी ज्ञानयज्ञ के रूप में पूजित होंगे।

भगवान कृष्ण का मानना है कि गीता के अध्ययन के माध्यम से व्यक्ति एक गहरा ज्ञान प्राप्त करता है, जो उसकी आत्मा के परिष्कार में सहायक होता है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस ज्ञान के प्रति श्रद्धा और सम्मान से वे स्वयं इस श्रद्धा को स्वीकार करते हैं। यहाँ पर 'ज्ञानयज्ञ' का अर्थ है कि ज्ञान की पूजा, जो गीता के अध्ययन और समझ के माध्यम से होती है। इस प्रकार, गीता के प्रति श्रद्धा और ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया स्वयं भगवान कृष्ण की पूजा का माध्यम बन जाती है।

इस श्लोक से हमें यह संदेश मिलता है कि गीता का अध्ययन न केवल आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए आवश्यक है, बल्कि यह भगवान कृष्ण की दिव्यता को भी मान्यता और सम्मान प्रदान करता है।