अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 62

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥

हिंदी अर्थ

हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है) जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा

सरल हिंदी व्याख्या

हे भारत! इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को मार्गदर्शन देते हुए कहते हैं कि वे सभी प्रकार की भौतिक और मानसिक बाधाओं को पार कर, पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ परमेश्वर की शरण में जाएं। "सर्वभावेन" का अर्थ है कि हर तरह से, पूरे दिल से, और सभी प्रकार की अपेक्षाओं और स्वार्थों को त्याग कर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए।

यह शरण ग्रहण करने का अर्थ है भगवान के प्रति असीम श्रद्धा और भक्ति का भाव रखकर, उनके गुणों, प्रभाव और स्वरूप का लगातार चिंतन करना। यह केवल पूजा-पाठ और भजन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने सभी कार्यों को भगवान की इच्छा और निर्देशों के अनुसार, निःस्वार्थ भाव से करना भी है।

यदि व्यक्ति इस प्रकार की पूर्ण शरण ग्रहण करता है, तो भगवान की कृपा से उसे न केवल परम शांति प्राप्त होती है, बल्कि वह शाश्वत और अमर परमधाम को भी प्राप्त करता है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल भगवान की शरण में जाकर ही वास्तविक शांति और शाश्वत स्थिति प्राप्त की जा सकती है।