अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
हिंदी अर्थ
जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से ज्ञान योग की परानिष्ठा की प्राप्ति की प्रक्रिया को संक्षेप में समझाने का निर्देश दे रहे हैं।
श्रीकृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं कि जिस प्रकार से एक व्यक्ति ज्ञान योग की उच्च स्थिति (नैष्कर्म्य सिद्धि) को प्राप्त करके ब्रह्म को प्राप्त करता है, वही विधि तू भी समझ।
यह श्लोक इस बात पर बल देता है कि ज्ञान योग की साधना से उच्चतम अवस्था की प्राप्ति कैसे होती है और यह भी बताता है कि ज्ञान योग में स्थिरता (निष्ठा) का महत्व कितना है।
सारांश:
श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि ज्ञान योग की निष्ठा से ही व्यक्ति ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है और इस प्रक्रिया को संक्षेप में समझाने के लिए वे अर्जुन को निर्देशित कर रहे हैं।