अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
हिंदी अर्थ
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है (जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके (जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना 'कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना' है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
श्लोक 46 में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के सिद्धि की प्राप्ति का मार्ग बताया है। इस श्लोक में कहा गया है कि जो परमेश्वर सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण हैं और जिनसे समस्त सृष्टि व्याप्त है, उनकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए।
प्रवृत्ति और व्याप्ति: श्लोक में यह बात की गई है कि जैसे जल से बर्फ पूरी तरह व्याप्त होती है, वैसे ही समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। परमेश्वर से सबकी उत्पत्ति होती है और वे ही सबका आधार हैं।
स्वकर्म और पूजा: मनुष्य को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए। यह पूजा केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में परमेश्वर को समर्पित करके करनी चाहिए। जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति समर्पित होती है और उसकी आज्ञाओं का पालन करती है, उसी प्रकार हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परमेश्वर को समर्पित रहना चाहिए।
सिद्धि की प्राप्ति: इस प्रकार अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा परमेश्वर की पूजा करके, मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। इसका तात्पर्य है कि जब हम अपने कर्मों को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देते हैं, तब हम जीवन की परम सिद्धि, अर्थात् मोक्ष या आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त कर लेते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म ही पूजा है और पूजा ही सिद्धि की कुंजी है। अपने स्वाभाविक कर्तव्यों को निभाते हुए, परमेश्वर को अपने जीवन का केंद्र बना लेना, यही वास्तविक पूजा और सिद्धि की प्राप्ति का मार्ग है।