अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
हिंदी अर्थ
हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जिस बुद्धि के माध्यम से व्यक्ति प्रवृत्तिमार्ग (सांसारिक कर्मों में रहते हुए भी भगवान के प्रति समर्पित रहना) और निवृत्तिमार्ग (संसार से विमुक्त होकर केवल आत्मज्ञान में लीन रहना) को सही ढंग से समझता है, कर्तव्य और अकर्तव्य में भेद करता है, भय और अभय की स्थिति को पहचानता है, और बंधन और मोक्ष की वास्तविकता को जानता है, वही बुद्धि सात्त्विक मानी जाती है।
यह श्लोक तीन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालता है:
प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग: प्रवृत्तिमार्ग वह मार्ग है जिसमें व्यक्ति सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी भगवान के प्रति समर्पण बनाए रखता है। निवृत्तिमार्ग वह मार्ग है जिसमें व्यक्ति संसार से दूर हटकर केवल आत्मज्ञान और परमात्मा में लीन रहता है। दोनों मार्गों की यथार्थता को समझना महत्वपूर्ण है।
कर्तव्य और अकर्तव्य: जो बुद्धि कर्तव्य (जो करना चाहिए) और अकर्तव्य (जो नहीं करना चाहिए) के बीच सही अंतर समझती है, वह बुद्धि सात्त्विक है।
भय और अभय: यह बुद्धि यह भी जानती है कि भय और अभय की स्थिति में क्या वास्तविकता है। भय और अभय की सही समझ व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने में मदद करती है।
बंध और मोक्ष: बंधन और मोक्ष की वास्तविकता को जानना, यह समझना कि बंधन और मोक्ष क्या हैं, और इनका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव है, यह भी सात्त्विक बुद्धि का लक्षण है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि सात्त्विक बुद्धि वह है जो उपरोक्त सभी तत्वों को सही तरीके से समझती है और उनके बीच संतुलन बनाए रखती है।