अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्॥
हिंदी अर्थ
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने तामस गुण से संबंधित एक विशेष प्रकार की आसक्ति का वर्णन किया है।
"यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्" - इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति किसी एक कार्य में पूरी तरह से आसक्त रहता है, बिना किसी कारण या तर्क के, केवल उसके परिणामों की चिंता करता है। इस प्रकार की आसक्ति में तात्त्विक दृष्टिकोण की कमी होती है।
"अतत्त्वार्थवदल्पंच" - यहाँ यह कहा गया है कि वह ज्ञान या कार्य जो सत्यमूलक नहीं है, यानि जो तात्त्विक रूप से महत्वहीन और सतही है, उसे तामस कहा जाता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि जब किसी व्यक्ति की आसक्ति कार्य की तात्त्विकता को समझे बिना केवल उसका परिणाम देखने तक सीमित होती है, तो वह तामस गुण का संकेत है। ऐसे ज्ञान या कार्य में गहराई की कमी होती है और यह अव्यावहारिक या अज्ञानी होता है।
इस प्रकार, श्लोक 22 में तामस गुण के अंतर्गत आने वाले कार्य और ज्ञान की सीमाओं और दोषों का उल्लेख किया गया है।