अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग

भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 6

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संस्कृत श्लोक

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌॥

हिंदी अर्थ

जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌ के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ''कृश करना'' है।), उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उपवास, कठोर तपस्या और अन्य अत्यधिक कष्टकारी साधनों के संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं, जो न केवल शरीर को कमजोर बनाते हैं, बल्कि आत्मा और परमात्मा को भी नुकसान पहुँचाते हैं। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों की निंदा की है जो इन कठोर आचरणों के माध्यम से शरीर और आत्मा को कष्ट देते हैं।

श्लोक में "कर्शयन्तः" शब्द का अर्थ है "कृश करने वाले" या "कष्ट देने वाले।" यह उन व्यक्तियों के बारे में है जो शरीर को अत्यधिक कष्ट देते हैं, जिससे शरीर कमजोर हो जाता है। इसी प्रकार, ये लोग अपने अंतःकरण में स्थित परमात्मा और भूतग्राम को भी कष्ट देते हैं।

श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि जो लोग अपने आचरण से शरीर और आत्मा को कष्ट पहुँचाते हैं, वे अज्ञानी और आसुरी प्रवृत्तियों वाले होते हैं। यह दिखाता है कि सच्ची साधना और भक्ति का मार्ग शारीरिक कष्ट देने के बजाय संतुलित और स्वस्थ होना चाहिए।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने आस्थाओं और साधनाओं की सही दिशा और उनके प्रभाव को समझाने का प्रयास किया है।