अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग
भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
हिंदी अर्थ
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान
सरल हिंदी व्याख्या
हे अर्जुन! इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि किसी भी प्रकार का यज्ञ, जो केवल दम्भ और दिखावे के लिए किया जाए या जिसके फल की प्राप्ति की लालसा से किया जाए, वह यज्ञ राजस गुण (राजसी प्रवृत्ति) से संबंधित है। यहाँ पर "अभिसन्धाय" का अर्थ है - "मन ही मन सोचकर" या "उद्देश्य रखते हुए", और "फल" का अर्थ है - "इनाम" या "लाभ"।
इस श्लोक में यह बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति यज्ञ करता है लेकिन केवल दम्भ दिखाने के लिए या किसी व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा से, तो वह यज्ञ राजस गुण के अंतर्गत आता है। इसका मतलब यह है कि उस यज्ञ की शुद्धता और पवित्रता की कमी होती है क्योंकि उसमें आत्मा की वास्तविक श्रद्धा और भक्ति का अभाव होता है।
इस प्रकार के यज्ञ में ईश्वर की उपासना की वास्तविक भावना नहीं होती, बल्कि यह यज्ञ केवल बाहरी दिखावे और व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जाता है। इस प्रकार के यज्ञ का परिणाम भी क्षणिक और अस्थायी होता है, और इसे सही अर्थ में एक सच्चा यज्ञ नहीं माना जा सकता।