अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव

भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 24

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संस्कृत श्लोक

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

हिंदी अर्थ

इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया है कि उनके कार्यों और अकार्य के निर्धारण के लिए शास्त्र ही अंतिम प्रमाण है। अर्थात्, शास्त्र के अनुसार ही यह निर्धारित करें कि कौन से कर्म योग्य हैं और कौन से कर्म अयोग्य हैं।

तस्मात् (इसलिए) का अर्थ है कि शास्त्र के अनुसार ही हमें अपने कार्यों का निर्धारण करना चाहिए।

शास्त्रं प्रमाणं (शास्त्र ही प्रमाण है) से तात्पर्य है कि शास्त्र का उपदेश और निर्देश हमारे कार्यों का मापदंड होना चाहिए।

कार्याकार्यव्यवस्थितौ (कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था) का मतलब है कि शास्त्र यह तय करता है कि कौन सा कर्म करना चाहिए और कौन सा नहीं करना चाहिए।

ज्ञात्वा (जानकर) का अर्थ है कि हमें शास्त्र की विदित विधियों को जानना और समझना चाहिए।

शास्त्रविधानोक्तं कर्म (शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट कर्म) से यह सिद्ध होता है कि शास्त्र के अनुसार निर्देशित कर्म ही करना चाहिए।

कर्म कर्तुमिहार्हसि (कर्म करने योग्य है) का मतलब है कि शास्त्र के निर्देशानुसार ही हमें अपने कार्यों को करना चाहिए।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सही कार्यों को जानने और करने के लिए शास्त्र की विधियों का पालन अत्यंत आवश्यक है।