अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
(क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का विषय)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
हिंदी अर्थ
इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार (गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है) के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
क्षर पुरुष: यह संसार के भौतिक रूप से संबंधित है, जो नाशवान है। इसका मतलब है कि यह सब भौतिक तत्व, प्राणी, और उनके शरीर (शरीर के सभी हिस्से, जीवित और निर्जीव) अस्थायी और बदलने वाले होते हैं। जैसे कि यह दुनिया, हमारे शरीर, और सभी भौतिक वस्तुएं समय के साथ बदलती हैं या नष्ट हो जाती हैं।
अक्षर पुरुष: यह जीवात्मा (आत्मा) का स्वरूप है, जो अविनाशी और शाश्वत होता है। अक्षर पुरुष का मतलब है कि आत्मा, जो कि हमारे वास्तविक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है, नाशवान नहीं होती। यह स्थायी और अमर है, और इसका अस्तित्व सदा रहता है।
इन दोनों पुरुषों के बीच का अंतर इस बात को दर्शाता है कि भौतिक संसार और आत्मा (आध्यात्मिक संसार) के गुण और स्वभाव बिल्कुल भिन्न होते हैं। भौतिक संसार क्षणिक और परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें समझाता है कि संसार में जो कुछ भी भौतिक है, वह अस्थायी है और जो कुछ भी आत्मा का हिस्सा है, वह शाश्वत है। इस तरह, हमें समझना चाहिए कि हम कौन हैं और इस भौतिक संसार की अस्थिरता से परे हमारी वास्तविक पहचान क्या है।