अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण

भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 4

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संस्कृत श्लोक

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि इस संसार में सभी जीवों की उत्पत्ति प्रकृति के माध्यम से होती है। यहाँ 'प्रकृति' का तात्पर्य सृष्टि के तीन गुण—सत्त्व, रजस, और तमस—से है, जो सभी प्राणियों के जन्म और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रकृति इन गुणों के माध्यम से सभी जीवों की "माता" के रूप में कार्य करती है, क्योंकि यह जीवों के शरीर और उनकी आवश्यकताओं को संजोने का कार्य करती है। वहीं, भगवान श्रीकृष्ण 'बीजप्रदाता' के रूप में कार्य करते हैं। यहाँ 'बीज' का अर्थ है जीवों का सूक्ष्म प्रारूप या आत्मा, जो उनके शरीर के निर्माण और विकास की नींव रखता है।

इस प्रकार, श्रीकृष्ण प्रकृति और जीवों के बीच एक मध्यस्थ के रूप में दिखाए जाते हैं, जहाँ प्रकृति जीवों के शरीर और अनुभव की व्यवस्था करती है और श्रीकृष्ण आत्मा का स्रोत और जीवन की शक्ति प्रदान करते हैं।

इस श्लोक के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण हमें यह भी समझाते हैं कि जीवन की जड़ें और आधार दोनों ही दिव्य हैं, और वे हमें इस जीवन के मूल तत्वों को समझने की प्रेरणा देते हैं।