अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण

भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 24

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संस्कृत श्लोक

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥

हिंदी अर्थ

जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवद गीता के अध्याय 14 के अंतर्गत प्रकृति के तीन गुणों के संदर्भ में आत्मा के गुणों का वर्णन किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण एक व्यक्ति के गुणों का वर्णन करते हैं जो उसे गुण और कर्म के प्रति दृष्टिकोण में स्थिर बनाए रखते हैं।

समदुःखसुखः स्वस्थः: यह व्यक्ति जो सुख और दुःख को समान दृष्टि से देखता है। उसके लिए दुःख और सुख एक ही हैं, जिससे वह मानसिक और भावनात्मक रूप से संतुलित रहता है।

समलोष्टाश्मकाञ्चनः: यह व्यक्ति मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान मानता है। उसकी दृष्टि में, भौतिक वस्तुओं की महत्ता और मूल्य में कोई अंतर नहीं है। यह गुण उसकी अद्वितीयता और तटस्थता को दर्शाता है।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरः: यह व्यक्ति प्रिय और अप्रिय वस्तुओं को समान मानता है। उसके लिए किसी चीज़ की प्रियता या अप्रियता का कोई महत्व नहीं है; वह सभी परिस्थितियों में स्थिर रहता है।

तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः: यह व्यक्ति अपनी निन्दा और स्तुति को समान रूप से स्वीकार करता है। उसकी आंतरिक स्थिति न तो निन्दा से प्रभावित होती है और न ही स्तुति से। यह गुण उसे एक स्थिर और संतुलित व्यक्ति बनाता है।

इस प्रकार, इस श्लोक में वर्णित व्यक्ति वह है जो जीवन की अस्थिरताओं और भौतिक वस्तुओं की क्षणिकता से परे एक स्थिर, संतुलित और समझदार दृष्टिकोण अपनाता है। यह आत्मज्ञान की ओर एक महत्वपूर्ण कदम को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहते हुए आंतरिक शांति प्राप्त करता है।