अध्याय 12: भक्तियोग
भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥
हिंदी अर्थ
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्तियोग की कठिनाई और उसके लाभ के बारे में बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो लोग अनिश्चित और अव्यक्त (अस्पष्ट) ब्रह्म को ध्यान में रखकर भक्ति करते हैं, उनके लिए यह मार्ग अधिक कठिन होता है। यहाँ पर 'अव्यक्ता' से तात्पर्य है कि निराकार, अदृश्य और अपार ब्रह्म को पकड़ना और समझना बहुत कठिन है।
इस कठिनाई के कारण, जो भक्त ऐसे ब्रह्म को ध्यान में रखते हैं, उनके लिए भक्ति का मार्ग बहुत ही क्लेशपूर्ण और दुःखदाई हो सकता है। यह कठिनाई इसलिए होती है क्योंकि उनके मन की चंचलता और शरीर की सीमाएँ इस ब्रह्म के अनन्त और अदृश्य स्वरूप को स्वीकार करने में बाधा डालती हैं।
इस श्लोक से यह भी स्पष्ट होता है कि जब भक्ति का मार्ग स्पष्ट और साकार रूप में हो, जैसे कि भगवान की एक निश्चित पूजा या उनकी लीलाओं का ध्यान, तो यह कठिनाई कम हो जाती है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि निराकार ब्रह्म की भक्ति कठिन हो सकती है, और इसके लिए विशेष प्रयास और धैर्य की आवश्यकता होती है।