अध्याय 12: भक्तियोग
भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥
हिंदी अर्थ
श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्तियोग के महत्व को समझाते हैं। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग अपने मन को मुझमें समर्पित कर देते हैं और निरंतर मेरी उपासना करते हैं, वे परम श्रद्धा और समर्पण के साथ भक्ति करते हैं, वे मेरे अनुसार सबसे उच्चस्तरीय भक्त माने जाते हैं।
अर्थ:
मय्यावेश्य मनो ये मां - जिन लोगों ने अपने मन को पूर्ण रूप से मेरे में समर्पित कर दिया है। नित्ययुक्ता उपासते - जो लोग नियमित रूप से मेरी उपासना और भक्ति करते हैं। श्रद्धया परयोपेतास्ते - जो लोग अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ मेरी उपासना करते हैं। मे युक्ततमा मताः - वे मेरे अनुसार सबसे उन्नत और उत्कृष्ट भक्त माने जाते हैं। इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के उच्चतम स्तर की व्याख्या करते हैं और बताते हैं कि एक सच्चा भक्त वह है जो मन, श्रद्धा और निरंतरता के साथ भगवान की उपासना करता है।