अध्याय 12: भक्तियोग

भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 16

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संस्कृत श्लोक

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है

सरल हिंदी व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में उन भक्तों के गुणों का वर्णन कर रहे हैं, जो उन्हें प्रिय होते हैं।

अनपेक्षः (अनपेक्ष): इसका अर्थ है "जो किसी भी अपेक्षा या आशा से मुक्त हो।" अर्थात्, जो भक्त किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत इच्छाओं या अपेक्षाओं से निर्लिप्त रहता है।

श्रुचि (शृचि): यह शुद्धता और पवित्रता का संकेत है। शुद्ध और पवित्र व्यक्ति उन सभी दोषों से मुक्त रहता है, जो आत्मा को बांधते हैं।

दक्ष (दक्ष): इसका मतलब है "सक्षम और योग्य।" ऐसा भक्त हर कार्य में दक्ष और कर्तव्यनिष्ठ होता है, बिना किसी असुविधा या विघ्न के।

उदासीनो (उदासीन): इसका मतलब है "निरपेक्ष और संयमित।" एक उदासीन व्यक्ति सभी सुख-दुख और परिस्थितियों के प्रति समान भाव रखता है।

गतव्यथः (गतव्यथा): इसका अर्थ है "जो सभी शोक और व्यथाओं से मुक्त हो।" इस भक्त को किसी भी प्रकार की मानसिक पीड़ा या चिंता नहीं होती।

सर्वारम्भपरित्यागी (सर्वारम्भपरित्यागी): इसका अर्थ है "जो सभी कार्यों या प्रपंचों का परित्याग कर चुका हो।" ऐसा भक्त दुनिया के सभी कार्यों और जुड़ावों से निरपेक्ष हो जाता है, केवल भगवान के प्रति समर्पित रहता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा भक्त, जो इन गुणों से युक्त होता है, मुझे अत्यंत प्रिय है। यह भक्त हर स्थिति में संतुलित और आत्मनियंत्रित रहता है और केवल मेरी भक्ति पर ध्यान केंद्रित करता है।