अध्याय 12: भक्तियोग

भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 11

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संस्कृत श्लोक

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥

हिंदी अर्थ

यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) कर

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्त के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश दे रहे हैं। यहाँ भगवान कह रहे हैं कि यदि किसी व्यक्ति को भक्तियोग का अभ्यास करने में कठिनाई हो रही हो, अर्थात् वह ईश्वर की उपासना और योग के मार्ग पर चलने में असमर्थ हो, तो वह क्या करे?

श्रीकृष्ण सुझाव देते हैं कि ऐसा व्यक्ति योग के बजाय, अपने कर्मों के फल को त्याग देने का प्रयास करे। इसका मतलब है कि अगर आप संपूर्ण रूप से ईश्वर की भक्ति में या योग में नहीं समर्पित हो सकते हैं, तो आप कम से कम कर्मों के फल की आसक्ति को त्याग दें। यानि, अपने कर्मों के परिणाम की चिंता छोड़ दें और कर्म करते रहें।

इससे यह समझ में आता है कि ध्यान और समर्पण की कमी होने पर भी, जब व्यक्ति अपने कर्मों को फल की इच्छा के बिना करता है, तब वह भी एक उच्च स्थिति की ओर अग्रसर हो सकता है। यह कर्मयोग की ओर संकेत करता है, जहाँ कर्म को उसकी नैतिकता और उद्देश्य के लिए किया जाता है, न कि केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए।

इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने भक्त को यह मार्ग दिखाया है कि कर्मों के फल की आसक्ति छोड़कर, वह भी आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।