अध्याय 11: विराट रूप

भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 53

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संस्कृत श्लोक

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।

शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा॥

हिंदी अर्थ

जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उनके विराट रूप को वेदों, तपस्या, दान, या यज्ञों के माध्यम से नहीं देखा जा सकता। यह विराट रूप केवल दिव्य दृष्टि वाले विशेष योगियों को ही दिखता है। श्री कृष्ण यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि उनके इस रूप को देखना या समझना केवल भक्ति और आध्यात्मिक दृष्टि से संभव है, न कि केवल बाहरी कर्मों द्वारा।

इस श्लोक का उद्देश्य यह है कि धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों से अधिक महत्वपूर्ण है आत्मा की गहराई और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा। यहाँ श्री कृष्ण यह बताना चाहते हैं कि केवल धार्मिक कर्मों से ही ईश्वर की दिव्यता का अनुभव नहीं किया जा सकता; इसके लिए एक उच्च स्तरीय आध्यात्मिक जागरूकता और भक्ति की आवश्यकता है।