अध्याय 11: विराट रूप
भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ।48॥
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि उनका विराट रूप, जो ब्रह्माण्ड के संपूर्ण स्वरूप को समेटे हुए है, केवल भौतिक साधनों और धार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा नहीं देखा जा सकता। वेद, यज्ञ, अध्ययन, दान, और तपस्या जैसी धार्मिक क्रियाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे इस विराट रूप की दिव्यता और उसकी व्यापकता को पकड़ने में असमर्थ हैं।
श्रीकृष्ण का यह संदेश है कि इस दिव्य रूप को केवल एक विशेष दृष्टि से ही देखा जा सकता है, जो कि उनकी कृपा और दिव्य आशीर्वाद से ही संभव है। इसका अर्थ यह है कि भगवान के विराट रूप की सच्ची अनुभूति और अनुभव के लिए भक्ति, समर्पण और ईश्वर की कृपा की आवश्यकता होती है, न कि केवल धार्मिक क्रियाओं से।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि भगवान के विराट रूप को अनुभव करने के लिए केवल बाहरी साधनों और कर्मकांडों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए एक गहरा आत्मिक अनुभव और आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है।