अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण
भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
हिंदी अर्थ
संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः।
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में संजय राजा धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन ने युद्ध आरम्भ होने से पहले अपने शोक और दुःख के कारण युद्ध में भाग लेने से इंकार कर दिया। अर्जुन ने अपने धनुष और बाण को छोड़ दिया और अपने रथ के पिछले भाग में जाकर बैठ गए। उनका मन युद्ध की विभीषिका और अपने परिवारजनों के विरुद्ध युद्ध करने के विचार से अत्यन्त उद्विग्न और शोकमग्न हो गया था। अर्जुन की यह स्थिति उनके आन्तरिक संघर्ष को दर्शाती है, जिसमें वे धर्म और कर्तव्य के बीच उलझन में हैं। यह क्षण गीता के महत्त्वपूर्ण संवाद का प्रारम्भिक बिंदु है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को उनकी शंकाओं और दुःखों से उबारकर धर्म का ज्ञान देंगे।
श्रीभगवद्गीता की समाप्ति के शब्द ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। अर्थ: इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता, जो उपनिषदों के समान पवित्र है, ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र का सार है, और श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के रूप में प्रस्तुत है, उसका प्रथम अध्याय, जिसे 'अर्जुन विषाद योग' कहा जाता है, समाप्त होता है।
यह अध्याय अर्जुन के मानसिक द्वंद्व और शोक को प्रस्तुत करता है, जो आगे के अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दी जाने वाली दिव्य शिक्षा के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है।