NI Act धारा 87: तात्त्विक परिवर्तन का प्रभाव
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 · अध्याय 7: वचन-पत्रों, विनिमय-पत्रों और चेकों पर दायित्व से उन्मोचन के विषय में
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¶87. तात्त्विक परिवर्तन का प्रभाव—परक्राम्य लिखत में का कोई भी तात्त्विक परिवर्तन उसे किसी के विरुद्ध भी, जो कि ऐसे परिवर्तन के समय उसका पक्षकार और उसके प्रति सम्मत नहीं हुआ है, तब के सिवाय शून्य कर देता है जब कि वह परिवर्तन मूल पक्षकारों के सामान्य आशय को पूरा करने के लिए किया गया हो;
¶पृष्ठांकिती द्वारा परिवर्तन—और यदि ऐसा कोई परिवर्तन पृष्ठांकिती द्वारा किया गया है, तो वह उसके प्रतिफल की बाबत उसके सब दायित्व से उसके पृष्ठांकक को उन्मोचित कर देता है ।
¶इस धारा के उपबंध धाराएं 20, 49, 86 और 125 के उपबंधों के अध्यधीन हैं ।
आधिकारिक संदर्भ: India Code, भारत सरकार — आधिकारिक हिंदी PDF — स्रोत समीक्षा: 5 अक्टूबर 2026.दर्ज संस्करण / स्नैपशॉट की तारीख: 2026-10-05.आधिकारिक हिंदी PDF से Banaka का संदर्भ प्रतिलेख; प्रमाणित या अलग दिनांकित समेकित संस्करण नहीं। PDF के खराब कॉपी-पेस्ट अक्षर-मानचित्र को उसके फ़ॉन्ट और अक्षर-संयोजन से पुनर्प्राप्त किया गया है। पंक्ति-विन्यास, पादटिप्पणी संकेत और अलग संशोधन टिप्पणियाँ हटाई गई हैं; मूल शब्द, उदाहरण और प्रावधान सुरक्षित हैं। PDF के स्रोत-वर्तनी और विराम-चिह्न अनियमितताएँ बनी हैं। समीक्षा की तारीख संस्करण की तारीख नहीं है। धारा 2 और ऐतिहासिक अनुसूची निरसित हैं। मूल PDF और लागू न्यायिक व्याख्या साथ पढ़ें।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
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इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 82. दायित्व से उन्मोचन
- 83. ऊपरवाल को प्रतिग्रहण के लिए अड़तालीस घण्टे से अधिक समय अनुज्ञात करने से उन्मोचन
- 84. जब कि चेक सम्यक् रूप से उपस्थापित नहीं किया गया और लेखीवाल को तद्द्वारा नुकसान हुआ
- 85. आदेशानुसार देय चेक
- 85A. आदेशानुसार देय ड्राफ्ट जो बैंक की एक शाखा ने दूसरी शाखा पर लिखे हैं
- 86. सम्मत न होने वाले पक्षकार विशेषित या सीमित प्रतिग्रहण द्वारा उन्मोचित हो जाते हैं
- 88. पूर्विक परिवर्तन के होते हुए भी प्रतिगृहीता या पृष्ठांकक आबद्ध रहता है
- 89. जिस लिखत पर परिवर्तन दृश्यमान नहीं है उसका संदाय
- 90. प्रतिगृहीता के हाथों में के विनिमय-पत्र पर कार्यवाही करने के अधिकारों का निर्वापन