माँ की संपत्ति किसे मिलती है?

धाराएँ 14–16 से महिला का स्वामित्व, सामान्य निर्वसीयती क्रम और माता-पिता या पति के परिवार से विरासत में मिली संपत्ति के अपवाद समझें।

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स्वामित्व और विरासत अलग प्रश्न हैं

धारा 14 सामान्यतः हिन्दू महिला के कब्जे की, अधिनियम से पहले या बाद में अर्जित संपत्ति को सीमित संपदा के बजाय उसके पूर्ण स्वामित्व में बताती है। स्पष्टीकरण में प्राप्ति के कई तरीके हैं। धारा 14(2) में निर्दिष्ट दान, वसीयत, लिखत, डिक्री, आदेश या पंचाट के ऐसे निबंधनों का अपवाद है जो सीमित संपदा विहित करते हैं। पहले देखें कि उनका स्वामित्व और व्ययन योग्य हित क्या था; ‘माँ की संपत्ति’ कह देना विवादित स्वामित्व तय नहीं करता।

उस संपत्ति की प्रभावी वसीयत हो तो निर्वसीयती क्रम अपने-आप उत्तर नहीं है। यह मार्गदर्शक केंद्रीय HSA की धाराओं 15–16 वाला निर्वसीयती उत्तराधिकार समझाता है। परिवार के उदाहरण मानते हैं कि HSA लागू है, महिला संपत्ति की स्वामी थी और प्रभावी वसीयत, प्रतिस्पर्धी स्वामित्व या धारा 17 की विशेष व्यवस्था नहीं है।

धारा 15(1) का सामान्य क्रम

पहले पुत्र और पुत्रियाँ—पूर्व-मृत पुत्र या पुत्री के बच्चों सहित—और पति आते हैं। इसके बाद पति के वारिस; फिर माता और पिता; फिर पिता के वारिस; और अंत में माता के वारिस। ये क्रमिक प्रविष्टियाँ हैं, एक साथ बराबर बाँटने वाला समूह नहीं। धारा 16 के नियम 1 में पहले की प्रविष्टि बाद वाली को बाहर करती है और एक प्रविष्टि के वारिस साथ लेते हैं।

धारा 16 के नियम 2 में पूर्व-मृत पुत्र या पुत्री के बच्चों को वह अंश मिलता है जो उनके माता या पिता जीवित होने पर लेते। नियम 3, महिला की मृत्यु के तुरंत बाद मानी गई मृत्यु के आधार पर पति, पिता या माता के वारिस पहचानने और बाँटने का तरीका देता है। पुरुष की वर्ग I सूची को न लगाएँ और उन वारिसों को संपत्ति प्राप्त होने की पुरानी तारीख पर स्थिर न मानें।

माता-पिता या पति के परिवार से विरासत में मिली संपत्ति

धारा 15(2)(क) पिता या माता से विरासत में मिली संपत्ति का विशेष क्रम देती है: पुत्र या पुत्री—जिसमें पूर्व-मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे शामिल हैं—न हों, तो वह संपत्ति धारा 15(1) के क्रम के बजाय पिता के वारिसों को जाती है। धारा 15(2)(ख) समान संतान-अभाव की शर्त पर पति या ससुर से विरासत में मिली संपत्ति को पति के वारिसों की ओर ले जाती है।

इन अपवादों में ‘विरासत में मिली’ संपत्ति की बात है। हर दान, खरीद, विवाह में मिला उपहार या रिश्तेदार से मिली संपत्ति को विरासत न मानें। पात्र जीवित वंशज होने पर धारा 15(2) का अपवाद लागू न हो सकता है। संपदा में अलग तरीकों से मिले साधन हों तो प्रत्येक का स्रोत पहचानें; एक परिवार-सूची हर साधन का एक ही अगला स्वामी जरूरी नहीं बताती।

संपत्ति का स्रोत क्यों महत्वपूर्ण है?

संपत्तिकेंद्रीय प्रारंभिक नियम
अपनी कमाई या खरीदधारा 15(1) का सामान्य क्रम; लागू अपवाद अलग देखें
पिता या माता से विरासत; पात्र संतान/वंशज नहींधारा 15(2)(क): पिता के वारिस
पति या ससुर से विरासत; पात्र संतान/वंशज नहींधारा 15(2)(ख): पति के वारिस

उदाहरण और अंश

पति और दो जीवित संतानें

सामान्य केंद्रीय धारा 15(1)(क) का काल्पनिक उदाहरण: महिला की अपनी संपत्ति, वसीयत नहीं, जीवित पति, एक पुत्र और एक पुत्री; पूर्व-मृत संतान की शाखा या अन्य पात्र संतान नहीं।

पूरी संपदा में अंश
वारिसअंश
पति1/3
पुत्र1/3
पुत्री1/3

तीनों पहली प्रविष्टि में हैं और एक-तिहाई अंश लेते हैं। माता-पिता बाद की प्रविष्टि में हैं और इस उदाहरण में साथ हिस्सा नहीं लेते।

पिता से विरासत में मिला घर

काल्पनिक उदाहरण: वह निर्वसीयत मरती हैं; पति जीवित हैं, लेकिन पुत्र, पुत्री या किसी पूर्व-मृत पुत्र या पुत्री का बच्चा नहीं है। घर पिता से विरासत में मिला था, दान या खरीद से नहीं। केंद्रीय धारा 15(2)(क) लागू है।

घर अपने-आप पति को जाने के बजाय पिता के वारिसों वाले क्रम में जाता है। धारा 16 का नियम 3 उन वारिसों को पहचानने के लिए जरूरी है; यहाँ ‘पिता के वारिस’ का अर्थ केवल भाई-बहन मानकर नहीं चला गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पति हमेशा अकेले वारिस होते हैं?

नहीं। सामान्य पहली प्रविष्टि में पात्र संतानें और पति साथ लेते हैं। पात्र संतान या वंशज न हों तो विरासत में मिली संपत्ति के अपवाद भी क्रम बदल सकते हैं।

क्या माता से विरासत में मिली संपत्ति हमेशा माता के वारिसों को जाती है?

नहीं। निर्दिष्ट संतान-अभाव की स्थिति में धारा 15(2)(क), माता से विरासत में मिली संपत्ति के लिए भी पिता के वारिस बताती है। यह न मानें कि जिस माता या पिता से संपत्ति आई, उसी के परिवार को लौटना जरूरी है।

बेटी पहले मर गई हो और उसका बच्चा हो तो क्या होगा?

कानून में पूर्व-मृत पुत्रों और पुत्रियों के बच्चे स्पष्ट रूप से शामिल हैं। धारा 16 में उनकी शाखा देखें; केवल अपनी संतानें जीवित न होने से महिला को पात्र वंशजों से रहित न बताएं।

संबंधित धाराएँ

यह क्रम कब लागू है?

ये केंद्रीय HSA के उदाहरण हैं। धारा 2 में लागू होने की शर्तें और अनुसूचित जनजातियों का अपवाद, धारा 5 की संपत्तियाँ, धारा 17 की विशेष व्यवस्था तथा राज्य कानून अलग जाँचें। उत्तराखंड के लागू UCC जैसे कानून उत्तराधिकार का क्रम बदल सकते हैं। उत्तराखंड का आधिकारिक UCC संदर्भ →

केवल संदर्भ के लिए; कानूनी सलाह नहीं। आधिकारिक HSA स्रोत →

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