अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥
हिंदी अर्थ
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह बताया है कि जो लोग साधना के मार्ग पर चलते हैं, वे अपने इन्द्रियाओं को संयमित करते हैं और उन इन्द्रियाओं को ज्ञान के अग्नि में समर्पित कर देते हैं।
श्रोत्रादि इन्द्रियाणि संयमाग्निषु जुह्वति: इसका अर्थ है कि कुछ लोग अपने कान, आंखें और अन्य इन्द्रियाओं को संयमित करते हैं और इन इन्द्रियाओं को तप के अग्नि में अर्पित कर देते हैं। इसका तात्पर्य है कि वे इन्द्रियातृष्णा और बाहरी आकर्षणों पर नियंत्रण रखते हैं और इन्हें साधना के मार्ग में प्रयोग करते हैं।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति: इसका अर्थ है कि अन्य लोग अपनी इन्द्रियाओं के माध्यम से प्राप्त होने वाले विषयों को, जैसे कि शब्द, रंग, और अन्य संवेगों को संयमित करते हैं। वे इन विषयों को संयमित करने के माध्यम से ज्ञान की अग्नि में अर्पित कर देते हैं, ताकि उनका ध्यान और साधना सही दिशा में रहे।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि सही साधना के लिए इन्द्रियाओं का संयम अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो लोग अपने इन्द्रियाओं को नियंत्रित करते हैं और उनकी वस्तुओं को साधना के अग्नि में समर्पित करते हैं, वे सच में उच्च आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होते हैं। यह श्लोक साधना और आत्मविवेक के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।