अध्याय 3: कर्मयोग

भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 23

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संस्कृत श्लोक

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

हिंदी अर्थ

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि मैं, जो स्वयं कर्मों का पालन करता हूँ, कभी भी कर्मों में सक्रिय नहीं रहता, तो इस संसार में लोग भी कर्मों को छोड़ देंगे और कर्मों में निष्क्रिय हो जाएंगे। इस प्रकार, मेरे कर्म न करने की स्थिति से सारे लोग प्रभावित होंगे और उनका कर्तव्य पालन भी प्रभावित होगा।

कृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे स्वयं कर्मों के आदर्श उदाहरण हैं और उनके बिना इस संसार के कर्मशीलता की धारणा ही बदल जाएगी। उनका कर्म योग की ओर प्रेरित होना सभी के लिए एक आदर्श है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह समझाता है कि व्यक्तिगत कर्म का पालन समाज में सकारात्मक प्रभाव डालता है और एक आदर्श नेतृत्व के रूप में कार्य करता है।