अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
हिंदी अर्थ
अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं
सरल हिंदी व्याख्या
श्लोक 42 में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्मों का वर्णन किया है। इस श्लोक के माध्यम से वे यह स्पष्ट करते हैं कि ब्राह्मण के गुण और कार्य केवल बाहरी आचार-विचार तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह उनके आंतरिक गुण और स्वभाव से जुड़े होते हैं।
शमो (अंतरात्मा का निग्रह): यह आत्म-नियंत्रण की प्रक्रिया है। इसका मतलब है कि एक व्यक्ति को अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। यह अनुशासन और संयम का परिचायक है।
दमस्तपः (इंद्रियों का दमन): इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए ताकि वे बुरी आदतों और इच्छाओं के प्रभाव में न आ सकें। यह आत्म-नियंत्रण का एक और पहलू है।
शौचं (धर्मपालन के लिए कष्ट सहना): यह बाहरी और आंतरिक शुद्धता की ओर संकेत करता है। इसका मतलब है कि व्यक्ति को धर्म का पालन करने के लिए कठिनाइयों को सहना चाहिए और अपने आचरण को शुद्ध रखना चाहिए।
क्षान्तिरार्जवमेव च (दूसरों के अपराधों को क्षमा करना और सरलता बनाए रखना): यह क्षमा और सरलता का महत्व बताता है। दूसरों की गलतियों को माफ करना और अपने व्यवहार को सरल रखना ब्राह्मण के गुण हैं।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक में श्रद्धा रखना और वेद-शास्त्रों का अध्ययन): यह ज्ञान की प्राप्ति और विज्ञान की समझ को प्रोत्साहित करता है। ब्राह्मण को वेद-शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए और धार्मिक और दार्शनिक विषयों में श्रद्धा रखनी चाहिए।
ब्रह्मकर्म स्वभावजम् (परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना): ब्राह्मण का सबसे महत्वपूर्ण कर्म परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना और उसे समझना है। यह उसकी साधना और तपस्या का परिणाम है।
इस श्लोक में बताए गए गुण और कर्म ब्राह्मण के आदर्श जीवन की दिशा को स्पष्ट करते हैं और यह दिखाते हैं कि ब्राह्मण का जीवन कैसे शुद्धता, संयम, और ज्ञान से परिपूर्ण होना चाहिए।