अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 19

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संस्कृत श्लोक

(तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।

प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥

हिंदी अर्थ

गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन

सरल हिंदी व्याख्या

ज्ञान: ज्ञान के भेद तीन गुणों के अनुसार अलग-अलग होते हैं। सत्त्वगुण से युक्त ज्ञान सत्य की पहचान करता है और ब्रह्मा को जानने में सहायक होता है। रजोगुण से युक्त ज्ञान केवल भौतिक और इच्छाओं से संबंधित होता है। तमोगुण से युक्त ज्ञान अज्ञान और भ्रांति को उत्पन्न करता है।

कर्म: कर्म भी तीन गुणों के अनुसार विभाजित होते हैं। सत्त्वगुण से युक्त कर्म धर्म और सत्य के अनुसार होता है। रजोगुण से युक्त कर्म स्वार्थ और लाभ की इच्छा से प्रेरित होता है। तमोगुण से युक्त कर्म आलस्य और अज्ञानता से प्रभावित होता है।

कर्त्ता: कर्ता या कार्यकर्ता का भी गुणों के अनुसार भेद होता है। सत्त्वगुण से युक्त कर्ता कर्म को सही उद्देश्य के लिए करता है। रजोगुण से युक्त कर्ता स्वार्थ और लाभ की भावना से प्रेरित होता है। तमोगुण से युक्त कर्ता कर्म को बिना किसी जागरूकता और प्रयत्न के करता है।

सुख: सुख का अनुभव भी तीन गुणों के आधार पर भिन्न होता है। सत्त्वगुण से उत्पन्न सुख आत्मा की शांति और संतोष प्रदान करता है। रजोगुण से उत्पन्न सुख भौतिक आनंद और तात्कालिक संतोष का अनुभव कराता है। तमोगुण से उत्पन्न सुख अत्यधिक आलस्य और अज्ञानता से जुड़ा होता है।

इस प्रकार, श्लोक का उद्देश्य यह समझाना है कि ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, और सुख के विभिन्न प्रकार तीन गुणों की दृष्टि से विभाजित होते हैं और इनका सही ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।