अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग

भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 19

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

हिंदी अर्थ

जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने तप के तीन प्रकारों में से तामसिक तप का वर्णन किया है। तामसिक तप वह है, जो अज्ञान और मूर्खता के कारण किया जाता है। इस तप में व्यक्ति अपने शरीर, मन और वाणी को अत्यधिक कष्ट देता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तपस्या को दूसरों की हानि पहुंचाने के उद्देश्य से करता है, तो भी वह तामसिक तप कहलाता है।

इसका अर्थ है कि जब तपस्या केवल दिखावे या दूसरों को कष्ट देने के लिए की जाती है, तो वह नकारात्मक होती है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपयोगी नहीं होती। इस प्रकार का तप ईश्वर की आराधना, आत्मसाक्षात्कार या समाज के लाभ के बजाय व्यक्तिगत दिखावे और अहंकार को बढ़ावा देता है।

तामसिक तप की इस स्थिति को समझकर हमें अपने तप और साधना की पद्धतियों की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि वे सही उद्देश्य और मार्गदर्शन के साथ की जाएं।