अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥
हिंदी अर्थ
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप के अद्वितीयता और सर्वज्ञानिता को स्पष्ट किया है। वे स्वयं अपने आप को, अपने सत्य स्वरूप को, पूरी तरह से जानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण, जो कि पुरुषोत्तम हैं, यथार्थ में सर्वज्ञ हैं और उन्होंने ही सृष्टि के हर जीव और तत्व की रचना की है।
यह श्लोक बताता है कि श्रीकृष्ण भूतों (सभी जीवों) के पालनकर्ता, भूतों के स्वामी और देवताओं के देवता हैं। वे संसार के भगवान हैं और वे ही सृष्टि के सभी प्राणियों के पालनकर्ता हैं। यहाँ 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ' से तात्पर्य है कि श्रीकृष्ण अपने आप को पूरी तरह से जानने वाले हैं, उनके ज्ञान की गहराई और व्यापकता अनंत है।
सारांश में, यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण की अद्वितीयता और सर्वज्ञता को दर्शाता है और उनके दिव्य ऐश्वर्य की पुष्टि करता है।