अध्याय 5: पाठ भाग 3
यह सम्पूरण क्रिया , पूरे 12 मास ,हर महीने के 15 वें, 21 वें दिन, 6 मास से पहले , और वर्ष के अंत से पहले करनी चाहिएं ।
पक्का हुआ भोजन परोसने से, 48 किये हुए श्राधों से , प्रेत योनी ख़तम होती है और वह पित्र्रों की सभा में चला जाता है। यदि यह श्राद्ध नहीं किये गए , तो प्रेत-योनी कभी समाप्त नहीं होती/ यह पुत्र अथवा विधवा स्त्री दुआरा अपने पति के लिए किये जाने पर अथाह ख़ुशी प्राप्त होती है/ जो स्त्री अपने पति के मरण उपरांत दह - संस्कार की 15 वें दिन और वार्षिक रस्में पूरी करती है, वह मेरे दुआरा " सच्ची अर्धांग्नी " कहलाई जाती है।
अग्नि, जल , खुदकुशी के कारण मृतु होने से, सब क्रिया कर्म करने चाहिएं ।
सर्प काटने से मृतु में, चावल के चूरन से कोबरा सांप की छवि बना कर , संदल , फूल, धुप, दूध ,तिल, चावल आदि से , हर 15वेन दिन के 5वेन दिन में पूजा करें।
नारायण - बलि की रस्म पूरी करें।
एक वर्ष तक , प्रत्येक दिन , " लाइ" और जल का दान करें ।.
11 वें दिन की यह सब क्रियाएं समाप्त होने के बाद , सभी पित्र्रों को " लाइ" अर्पण करके, स्थान को साफ़ करके, बिस्तर और अन्य उपहारों का दान दें।
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