अध्याय 5: ग्यारहवें दिन की रस्में
11 वें दिन की रस्में :- ~ देवंग्त आत्मा को " लाइ " का प्रसाद भेंट करें ।
विष्णु भगवान् की स्वर्ण की मूर्ती, ब्रह्मा की चांदी , शिव की ताम्बे की , और यमराज की लोहे की मूर्तिओं की स्थापना करें ।
पश्चिम दिशा की ओर , विष्णु देव के लिए ,गंगा जल से भरा एक लोटा रखें । इस लोटे के ऊपर ,पीले कपड़ों में सुस्जित विष्णु जी की मूर्ती रखें ।
पूर्व में दूध और पानी से भरे लोटे पर , सफ़ेद वस्त्रों में , ब्रह्मा जी की मूर्ती रखें ।
उत्तर में शहद और घी के लोटे पर, लाल वस्त्र में , शिव जी की मूर्ती रखें।
दक्षिण में , बारिश के पानी से भेरे लोटे पर, काले वस्त्र में यम राज की मूर्ती रखें।
अब पुत्र को अपने दाहिने कंधे पर पवित्र जनेऊ धारण करके , दक्षिण की ओर मूंह करके, बीच में एक गोल चक्कर बना कर, उस में कुषा -घास ,रख कर ,वैदिक मन्त्रों के साथ , सभी देवों को जल अर्पित करे, अग्नि को भेंट अर्पण करके , 11 वें दिन का श्राद्ध पूर्ण करे।
अपने पितरों की ख़ुशी के लिए, एक गौ का दान करे ।
ब्रह्मिन के पैर धो कर , दूध, मिठाई और भोजन खिलाये ।
बिस्तर पर एक सोने की मूर्ती रख कर ,उस की पूजा करके,बिस्तर का दान करे ।
11 वें दिन एक सांड , जिस का पूरा शरीर काले-भूरे रंग का हो,पित्र्रों की ख़ुशी के लिए दान करना चाहिए । अपने से दान किये हुए सांड से ,बचपन ,जवानी,वृद्ध अवस्था में किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं.।
सांड का दान करने पश्चात 16 श्राद्ध ( 10 पिंड और 6 पहले बताए हुए ) पूरण करें / पहले 16 श्राद्ध अपवित्र माने जाते हैं । इस के बाद दुसरे मध्य 16 पवित्र माने जाते हैं ।
पहला "लाइ" का दाना ,विष्णु जी को , "2" सरा - रूद्र देव "3" - यम देव "4" - महाराज सोम "5" - देवी देवता "6" - पितरों "7" - मृतु "8" - रूद्र देव "9" - पूरुसा "10" - देव्न्ग्त "11" - विष्णु "12" - ब्रह्मा "13" - विष्णु "14" - रूद्र "15" - यम देव "16" - पूरुसा
यह सम्पूरण क्रिया , पूरे 12 मास ,हर महीने के 15 वें, 21 वें दिन, 6 मास से पहले , और वर्ष के अंत से पहले करनी चाहिएं ।
पक्का हुआ भोजन परोसने से, 48 किये हुए श्राधों से , प्रेत योनी ख़तम होती है और वह पित्र्रों की सभा में चला जाता है। यदि यह श्राद्ध नहीं किये गए , तो प्रेत-योनी कभी समाप्त नहीं होती/ यह पुत्र अथवा विधवा स्त्री दुआरा अपने पति के लिए किये जाने पर अथाह ख़ुशी प्राप्त होती है/ जो स्त्री अपने पति के मरण उपरांत दह - संस्कार की 15 वें दिन और वार्षिक रस्में पूरी करती है, वह मेरे दुआरा " सच्ची अर्धांग्नी " कहलाई जाती है।
अग्नि, जल , खुदकुशी के कारण मृतु होने से, सब क्रिया कर्म करने चाहिएं ।
सर्प काटने से मृतु में, चावल के चूरन से कोबरा सांप की छवि बना कर , संदल , फूल, धुप, दूध ,तिल, चावल आदि से , हर 15वेन दिन के 5वेन दिन में पूजा करें।
नारायण - बलि की रस्म पूरी करें।
एक वर्ष तक , प्रत्येक दिन , " लाइ" और जल का दान करें ।.
11 वें दिन की यह सब क्रियाएं समाप्त होने के बाद , सभी पित्र्रों को " लाइ" अर्पण करके, स्थान को साफ़ करके, बिस्तर और अन्य उपहारों का दान दें।
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