अध्याय 13: पाठ भाग 3
कुछ ही क्षणों में उस ने एक भयानक प्रेत आत्मा को देखा जो भूख और प्यास से व्याकुल थी । वह प्रेत आत्मा राजा के सामने आकर बोली , हे राजन , आप की कृपा से आज मुझे,इस दुर्गति से छुटकारा मिला है। मैं आपका आभारी हूँ ।
राजा के उसकी दुर्गति का कारण पूछने पर प्रेत ने कहा कि वह भी एक देश का राजा था । ब्राह्मणों की सेवा, दान -पुण्य ,नियमत रूप से करता था। पूर्वजों के श्राद्ध भी समय पर निपुण होते थे । परन्तु यह सब व्यर्थ हो गया क्योंकि उस के कोई सन्तान नहीं थी । कोई मित्र , कोई सम्बन्धी , जो मेरे मरण उपरान्त मेरी अंतेष्टि विधि पुर्वक करता जिस के कारण मेरी यह दुर्गति हुई । यदि मासिक १६ श्राद्ध पूरण नहीं होते तो , 100 वार्षिक श्राद्ध करने पर भी ,मेरी गति नहीं हो सकती।
राजा ने आश्वासन दिया कि वह उस की परमगति के लिए ,वह सब प्रयास करे गा , जो वह करने को कहे गा।
प्रेत ने यह सब विधिं कहीं : विष्णु पूजा : 2 शुद्ध सोने के टुकड़ों से, जो धन, छल ,कपट से न कमाया गया हो, श्री नारायण की मूर्ती बनवा कर, पवित्र जल से धुला कर, पीले वस्त्र , गहिनो से सज्जा कर ,पवित्र स्थान पर रख कर , इन के :
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