अध्याय 13: प्रेत का रूप और निवारण

प्रेत का रूप और उसका निवारण ~ गरुड़ जी भगवान् विष्णु जी से पूछते हैं, की जो मनुष जाने , अनजाने में पाप कर्म कर बैठते हैं , वह यमदूतों की यातनाओं से कैसे बच सकते हैं । प्रेतों के रूप किन कर्मों दुआरा बनते हैं । किस शुभ दान से प्रेत योनी छूट जाती है।

श्री हरी कहते हैं ,कि पाप कर्मिओं को , और जिन के पुत्र नहीं होता , दोनों अवस्था में बचना बहुत कठिन है।

मनुष्य को पुत्र प्राप्ति के लिए , हरिवांसा का पाठ, साताचांदी या रूद्र भगवान् की पूजा करनी चाहि। फिर भी दिवंगत आत्माएं स्वर्ग लोक तक जाती हैं , यदि उन का संस्कार, पुत्र न होने की अवस्था में ,कोई दुसरेमनुष्य दुआरा विधि पूर्वक किया जाए ।

जो पूर्व जन्म संचित कर्म के अधीन रह कर पाप कर्म में अनुरक्त रहते हैं, अपने धर्म को त्याग कर ,दुसरे धर्म को स्वीकार करता है, विद्या और सदाचार से वंचित है, वह प्रेत योनी में जन्म लेते हैं ।

जीव अपने कर्मों अनुसार दुसरे शरीर को प्राप्त करके यम लोक में नाना प्रकार के कष्ट भोगता है। यम लोक के मार्ग में 16 पुर पड़ते हैं। संसार में धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष , यह चार मार्ग हैं

"धर्म" - मार्ग पर , उत्तम प्रकृति वाले प्राणी चलते हैं।

"अर्थ" - अर्थात धन -धान्य का दान करने वाले प्राणी, विमान से परलोक जाते हैं।

"काम" - जो प्राणी अभिलक्षित याचक की इच्छा को संतुष्ट करते हैं, वह कंधे पर सवार हो कर प्रस्थान करते हैं।

"मोक्ष" - जो प्राणी मोक्ष की आकांक्षा रखते हैं ,वह हंस युक्त विमान से परलोक को जाते हैं ।

राजा बाभ्रुवाहाना की कथा :

त्रेता युग में ,बभ्रुवाहाना नाम के एक बहुत पराक्रमी, तेजस्वी , लोक प्रिय राजा थे । उन के राज में पूरण सम्पनता थी। ब्राह्मिनो का आदर सत्कार, रीती-रिवाज वह पूरी श्रधा के साथ करते थे।

एक दिन वह अपने मंत्रिओं के साथ जंगल में शिकार खेलने गये । एक हिरन पर वार किया। घायल मृग , तीर के साथ जंगल के भीतर भागा। राजा भी उस के खून के निशान के पीछे पीछे , सुनसान जंगल में जा कर खो गया। भूख और प्यास से परेशान राजा एक झील के पास पहुंचा । झील में स्न्नान कर ,ठंडा पानी पी कर , जब वह बाहिर आया ,तो उसने एक खूबसूरत अंजीर का पेड़ देखा। अंजीर के पेड़ की छाया में वह बैठ गया।

कुछ ही क्षणों में उस ने एक भयानक प्रेत आत्मा को देखा जो भूख और प्यास से व्याकुल थी । वह प्रेत आत्मा राजा के सामने आकर बोली , हे राजन , आप की कृपा से आज मुझे,इस दुर्गति से छुटकारा मिला है। मैं आपका आभारी हूँ ।

राजा के उसकी दुर्गति का कारण पूछने पर प्रेत ने कहा कि वह भी एक देश का राजा था । ब्राह्मणों की सेवा, दान -पुण्य ,नियमत रूप से करता था। पूर्वजों के श्राद्ध भी समय पर निपुण होते थे । परन्तु यह सब व्यर्थ हो गया क्योंकि उस के कोई सन्तान नहीं थी । कोई मित्र , कोई सम्बन्धी , जो मेरे मरण उपरान्त मेरी अंतेष्टि विधि पुर्वक करता जिस के कारण मेरी यह दुर्गति हुई । यदि मासिक १६ श्राद्ध पूरण नहीं होते तो , 100 वार्षिक श्राद्ध करने पर भी ,मेरी गति नहीं हो सकती।

राजा ने आश्वासन दिया कि वह उस की परमगति के लिए ,वह सब प्रयास करे गा , जो वह करने को कहे गा।

प्रेत ने यह सब विधिं कहीं : विष्णु पूजा : 2 शुद्ध सोने के टुकड़ों से, जो धन, छल ,कपट से न कमाया गया हो, श्री नारायण की मूर्ती बनवा कर, पवित्र जल से धुला कर, पीले वस्त्र , गहिनो से सज्जा कर ,पवित्र स्थान पर रख कर , इन के :

पूर्व में - श्रीधर दक्षिण में - मधुसुदन पश्चिम में - वामन देव उत्तर में - गदाधारी

इन के बीच में पितामाह और माहेश्वर । इन सब की रीती अनुसार पूजा करें।

एक सांड को छोड़ने का भी प्रयोजन है। एक शय्या, 13 ब्राह्मिनो को पद दान और एक सोने से बना मटका, दूध और घी से भरा हुआ ,ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पूजने के पश्चात अर्पित किया हुआ, ब्रह्मिन को दान में दिया जाता है।

जंगल में से अपने मंत्रियो के साथ बाहिर निकल कर , राजा के दुआरा की गई रस्मों, , श्राधों से उस प्रेत आत्मा को सद -गति प्राप्त हुई।

एक अनजान व्यक्ति दुआरा पूरण की हुई श्राधों की रस्मों से यदि प्रेत-आत्मा को गति मिल सकती है तो पुत्र दुआरा सम्पन्न किये जा पर , कितना लाभ हो सकता है ।

जो भी इस पवित्र कथा को सुनता है , या दूसरों को सुनाता है, कभी भी प्रेत- योनी में नहीं जाता ।

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