अध्याय 13: पाठ भाग 4

पूर्व में - श्रीधर दक्षिण में - मधुसुदन पश्चिम में - वामन देव उत्तर में - गदाधारी

इन के बीच में पितामाह और माहेश्वर । इन सब की रीती अनुसार पूजा करें।

एक सांड को छोड़ने का भी प्रयोजन है। एक शय्या, 13 ब्राह्मिनो को पद दान और एक सोने से बना मटका, दूध और घी से भरा हुआ ,ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पूजने के पश्चात अर्पित किया हुआ, ब्रह्मिन को दान में दिया जाता है।

जंगल में से अपने मंत्रियो के साथ बाहिर निकल कर , राजा के दुआरा की गई रस्मों, , श्राधों से उस प्रेत आत्मा को सद -गति प्राप्त हुई।

एक अनजान व्यक्ति दुआरा पूरण की हुई श्राधों की रस्मों से यदि प्रेत-आत्मा को गति मिल सकती है तो पुत्र दुआरा सम्पन्न किये जा पर , कितना लाभ हो सकता है ।

जो भी इस पवित्र कथा को सुनता है , या दूसरों को सुनाता है, कभी भी प्रेत- योनी में नहीं जाता ।

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