अध्याय 11: सपिण्डीकरण

स्पिन्दिक्र्ण ~ जब मनुष मरने के बाद एक वर्ष की महा पथ की यात्रा करता है तो वह पुत्र -पौत्र आदि के दुआरा स्पिन्दिक्र्ण हो जाने पर पितृ लोक में चला जाता है । वर्ष के अंत में पित्री -पिंडों के साथ प्रेत -पिंड का मिलन हो जाने से वह प्रेत , परम गति को प्राप्त करता है ।

गृस्थ पिता की मृतु हो जाने पर , यदि स्पिन्दीक्र्ण श्राद्ध नहीं हुआ है, तो किसी का विवाह -संस्कार नहीं हो सकता इस लिए दुआद्श को ही पुत्र को स्पेंदीक्र्ण कर देना चाहिए । यह करने के बाद भी 12 महीने तक पोड्श श्राद्ध नियमानुसार करना चाहिए ।

मृतक का दाह -संस्कार हो जाने के बाद . एकादश , दुआद्श , इन दोनों दिन में प्रेत भोजन करता है । इन दोनों दिन, जो कुछ भी प्राणी के निमित दिया जाता है , उसे " प्रेत" शब्द के साथ दिया जाना चाहिए ,क्योंकि वह मृतक के लिए आनन्दायक होता है। सपिन्दिकर्ण कर देने के बाद जो भी दान दिया जाता है ,वह नाम-गोत्र करके पित्री -निमित करना चाहिए। प्रेत दुआदश-संस्कार के अवसर पर यजमान जल से भरे 12 घटों का संकल्प करके दान करे । पकवान और फल से परिपूर्ण एक एक वेर्धनी ( विशेष प्रकार का जल पात्र ), भगवान् विष्णु , यमराज , चित्र गुप्त का संकल्प करके सुयोग ब्राह्मिन को प्रदान करे।

स्पिन्दा की रस्म अपवित्र दिनों के बाद, बारहवें दिन ,अग्नि के समक्ष या बिना अग्नि के ,पूरण होती है ।

विधि : ~ नहा धो कर, मृतु वाले स्थान को गोबर से पोत कर, स्थापित देवों की मूर्तिओं के चरण धो कर,पित्तरों को "लाइ" अर्पण करके , पुत्र अनच्मन से थोडा जल ग्रहण करे।

3,3 "लाइ" के दाने , वासु देव , रूद्र ,और अर्का को अपने दादा, और उनसे पूर्वज के रूप में , और फिर मृतक को अर्पण करे।

सभी की संदल चटनी, तुलसी पत्ते ,धुप, सुगन्धित वस्तुओं, उपहार आदि से पूजा करे।

मृतक को दिए हुई श्रधान्जली को एक सोने की सलाख से तीन भागों में बाँट कर ,एक,एक भाग , दूसरों में अच्छी प्रकार , मिला लें ।

माता श्री का स्पिन्दा , दादिओं के साथ , और पिता का स्पिन्दा , दादाओं के साथ करना चाहिए।

यदि पिता की मृतु , दादा के जीवत रहते हुए हो जी है , तो ३ लाइ के दाने पढ़ - दादा और उनके पूर्वजों को श्रधान्जली देनी चाहिए।

पत्नी की मृतु पर, यदि पुत्र न हो तो, पति को अपनी सास और सम्बन्धियों के साथ रस्म करनी चाहिए ।

फिर ब्रह्मिनों को भोज , दाद, दक्षिणा, उपहारों और 12 घट जल से परिपूर्ण दान करने चाहिए।

धारण किये वस्त्रों का त्याग करके, एक शय्या दान करे। शय्या बहुत मूल्यवान ,सभी सुख प्रदान करने वाले साधनों से युक्त , छाता, चांदी के लैम्प , इस भगवान् नारायण और लक्ष्मी जी मूर्ती कपड़ों, गैह्नो से सुस्जित, गदा , आदि होनी चाहिए।

स्त्रिओं की रस्म में लाल कपडा , जेवर के साथ अन्य सामग्री होनी चाहिए।

फिर एक ब्रह्मिन को उसकी पत्नी के साथ, शय्या पर ,नारायण-लक्ष्मी जी के सामने बिठा कर , उतर दिशा को मुख करके ,लक्ष्मी-नारायण जी को फूल माला पहना कर पूजा करके,यह उच्चारण करे, "हे नाथ, जिस प्रकार आप की शय्या दूध का सागर है ,यह शय्या भी उसी प्रकार मेरे अगले जन्मों में सुखदाई हो " । ब्राह्मिन और प्रभु को पुष्पांजली देते हुए , ब्राह्मिन को सम्भोदित करके " हे ब्राह्मिन देवता, इस को स्वीकार करें" कह कर शय्या दान करे। उस शय्या पर विराजमान सभी को तीन बार झूला दे । शय्या के चारों ओर चक्कर काट कर सब से विदाई ले ।

शय्या दान की रस्म पूरी हो जाने के बाद 13, पद -दान की रस्में ,जिसमें 1,1, छाता,चपल ,कपडे, अंगूठी ,जल का मटका ,कुषा, 5 बर्तन ( यह सात प्रकार के पद ), इन के साथ एक लकड़ी का डंडा ,ताम्बे का बर्तन ,कच्चे चावल,जनेऊ और खाने की सामग्री , 13 ब्राह्मिनो को 12 वें दिन दान करने से दिवंगत आत्मा को शान्ति मिलती है।

स्पिन्दा रस्म करने के बाद , वार्षिक श्राद्ध से पहले, हर मास, एक लोटा जल के साथ "लाइ" का दान करते रहना चाहिए।

स्पिन्दा , मासिक और वार्षिक श्राद्ध , संक्रात में नहीं करने चाहिएं / यदि वर्ष में 13 महीने आते हैं , तो वार्षिक श्राद्ध 13वेन महीने में होना चाहिए।

जब संक्रात नहीं है , "लाइ" की आवश्कता नहीं होती । केवल संक्रात में आवश्कता होती है।

वार्षिक श्राद्ध के उपरान्त ,सदा ही 3 श्राधान्ज्लियाँ देनी चाहियें । एक श्राधांजलि पूर्वजों के लिए घातक होती है ।

गया में श्राद्ध , पूर्वजों के लिए मुक्ति दायक होता है।

मनुष्य को प्रयत्न शील होना चाहिए की वह अपनी ओर से पूर्वजों की भलाई ,हर प्रकार से करे। इस से वह इस लोक में ही नहीं ,परलोके में भी आनन्दित रह गा ।

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