अध्याय 3: कर्मयोग
भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥
हिंदी अर्थ
परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान कृष्ण उन लोगों के बारे में बात कर रहे हैं जो उनके उपदेशों की अवहेलना करते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग उनके द्वारा बताए गए कर्मयोग के सिद्धांतों की निंदा करते हैं और उनका पालन नहीं करते, उन्हें निम्नलिखित प्रकार से समझना चाहिए:
अभ्यसूयन्तो – जो लोग ईर्ष्या या द्वेष से उनके उपदेशों की आलोचना करते हैं। नानुतिष्ठन्ति मे मतम् – जो लोग उनके बताये हुए मार्ग का अनुसरण नहीं करते, यानी जो कर्मयोग के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करते और उनके अनुसार कार्य नहीं करते। सर्वज्ञानविमुढ़ांस्तान्विद्धि – ऐसे लोग सारे ज्ञान से विमुख होते हैं। उनका ज्ञान भ्रमित और भ्रष्ट हो चुका होता है। नष्टानचेतसः – उनके मन की स्थिति नष्ट और पतित हो जाती है। वे आत्मज्ञान से दूर हो जाते हैं और उनकी मानसिक स्थिति खराब हो जाती है। इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जो लोग उनके उपदेशों को नहीं मानते और केवल आलोचना करते हैं, वे ज्ञान और समझ की दृष्टि से खो चुके होते हैं। उन्हें सही मार्ग पर आने के लिए अपने मन को सही दिशा में ले जाने की आवश्यकता है।